मैं रिश्ते-नाते भूल कर चुद गई-1

मैं रिश्ते-नाते भूल कर चुद गई-1

सारिका कँवल
नमस्कार, मैं सारिका कँवल आप सभी पाठकों का धन्यवाद करना चाहती हूँ कि आप सबने मेरी कहानियों को इतना सराहा।

मैं चाहती हूँ कि मैं आप सबको इसी तरह की कहानियाँ सुनाती रहूँ, ताकि आप हमेशा खुद को आनन्दित महसूस करें।

मैं आज जो कहानी सुनाने जा रही हूँ वो मेरे जीवन की एक कड़वी दवाई की तरह सच है क्योंकि पता नहीं आप लोग इस कहानी को पढ़ कर मेरे बारे में क्या सोचेंगे।
फिर भी बड़ी हिम्मत करके मैंने तय किया कि आप लोग मेरे बारे में जो भी सोचें, मैं आपके मनोरंजन के लिए इसे भी लिख देती हूँ।
दरअसल मुझे इसलिए कहानी लिखने में थोड़ी हिचकिचाहट हो रही थी क्योंकि मेरे जिनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बने वो मेरे रिश्तेदार ही लगते हैं।

मेरा उनसे क्या रिश्ता है मैं यह नहीं बताना चाहूँगी, पर जो कुछ भी और कैसे हुआ वो जरुर विस्तार से बताऊँगी।

बाद दो साल पहले की है वैसे भी मेरे पति और मेरे बीच के रिश्तों के बारे में आप सबको पहले से ही पता है।

मेरे पति के एक रिश्तेदार हैं जो पहले फ़ौज में थे और अब अपने गाँव में बस खेती-बाड़ी देखते हैं।
उनका एक ही बेटा है जो कि दुबई में काम करता है और दोनों पति-पत्नी घर पर अकेले ही रहते हैं।

गाँव में अच्छी खासी खेती-बाड़ी है और गाँव के लोग उनकी बहुत इज्ज़त करते हैं क्योंकि बहुत से लोगों को वो अपने यहाँ काम पर रखे हुए हैं।

वो बहुत ही साधारण किस्म के इंसान हैं, उनका रहन-सहन बिलकुल साधारण है। उनकी उम्र करीब 70 की होगी, पर दिखने में 50-55 के लगते हैं।

वो आज भी खेतों में खुद काम करते हैं। जब मैंने पहली बार उनको देखा था तब करीब 50 किलो वजन की बोरी उठा कर घर से गोदाम में रख रहे थे।

मैं उनको देख कर हैरान थी कि वे इस उम्र में भी इतना काम कर लेते हैं। उनका भोजन भी सादा ही होता था, सुबह उठ कर टहलने जाते थे और फिर आकर थोड़ा योग करते थे, काफी तंदुरुस्त, थोड़े से सांवले, कद करीब 6 फीट लम्बे, पेट थोड़ा निकल गया था, पर फिर भी दिखने में अच्छे लगते थे।
उनके कंधे चौड़े, मजबूत बाजू देख कर कोई भी पहचान लेता कि वे फौजी हैं।

बात यूँ हुई कि दो साल पहले उनकी बीवी की बच्चेदानी में घाव हो गया था और तबियत बहुत ख़राब थी।
उनका बेटा और बहू तो दुबई में थे, हालांकि देखभाल के लिए नौकर थे पर अपना कोई नहीं था इसलिए मेरे पति ने मुझे उनके पास छोड़ दिया, क्योंकि मेरे घर पर बच्चे अब इतने बड़े हो चुके थे कि उनका ध्यान मेरी देवरानी और जेठानी रख सकते थे।

मेरे पति मुझे वहाँ अकेले छोड़ कर वापस आ गए।
मैं करीब 15 दिन वहाँ रही थी और इसी बीच ये घटना हो गई।

मुझे करीब एक हफ्ता हो गया था इस बीच मैं खाना बनाने के अलावा सबको खाना देती और उनकी पत्नी को दवा देती, उनकी साफ़-सफाई में मदद करती थी।

एक शाम उनकी पत्नी की तबियत बहुत ख़राब हो गई, वो दर्द से तड़पने लगीं, पास के डॉक्टर को बुलाया गया तो उसने उन्हें बड़े अस्पताल ले जाने को कहा।
तुरंत गाड़ी मंगवाई गई और फ़ौरन उन्हें बड़े अस्पताल ले जाया गया। मैं भी उनके साथ थी।

अस्पताल पहुँचते ही उन्हें भरती कर लिया गया।
रात के करीब 10 बज चुके थे और वो अब सो चुकी थीं।

मुझे भी थकान हो रही थी, इसलिए मुझसे उन्होंने कहा- अस्पताल के लोगों के लिए पास में एक गेस्ट-हाउस है, वहाँ एक कमरा ले लेते हैं ताकि हम भी कुछ आराम कर लें।

मैंने तब उनसे कहा- आप चले जाइये, मैं यहीं रूकती हूँ।

वो जाते समय डॉक्टर से मिलने चले गए, फिर थोड़ी देर बाद वापस आए और कहा कि उनकी बीवी का ऑपरेशन करना होगा, सो अब एक कमरा लेना ही पड़ेगा, पर अभी उन्हें सोने की दवा दी गई है। सो सुबह तक मुझे रुकने की जरूरत नहीं है, मैं भी साथ में चलूँ और आराम कर लूँ क्योंकि सुबह फिर आना है।

मैंने भी सोचा कि ठीक ही कह रहे हैं और मैं साथ चल दी।

गेस्ट-हाउस पहुँचे तो हमने दो कमरे की बात कही, पर उनके पास बस एक ही कमरा था और वो भी एक बिस्तर वाला था।

उन्होंने मुझसे कहा- चलो आज रात किसी तरह काम चला लेते हैं, कल कोई खाली होगा तो दूसरा ले लेंगे।

मैंने भी सोचा कि ये तो मेरे पिता समान हैं कोई हर्ज़ नहीं है, सो मैंने ‘हाँ’ कर दी।

उस गेस्ट-हाउस की हालत देख कर लग रहा था कि इधर कितनी भीड़ रहती होगी, कुछ लोग काउंटर पर ही सो रहे थे।

क्योंकि शायद उनके पास पैसे कम होंगे और कुछ लोगों ने तो कमरे को जाने वाले रास्ते में ही फर्श पर ही अपना बिस्तर लगा रखा था।
ज्यादातर लोग अभी भी जगे हुए थे और कुछ लोग खाना खा रहे थे।

सभी आस-पास के गाँव से आए हुए लग रहे थे। हम दोनों अपने कमरे में आ गए, बत्ती जलाई तो देखा कि कमरा बहुत छोटा था।
बस सोने लायक ही था।

हमने बस यही सोच कर कमरा पहले नहीं देखा था, क्योंकि गेस्ट-हाउस के मैनेजर ने कहा था कि उनके पास बस एक ही कमरा खाली है।

मेरे साथ आए रिश्तेदार ने कहा- कुछ खाने को ले आता हूँ।

मैंने मना कर दिया क्योंकि इस भाग-दौड़ में मेरी भूख मर गई थी।

पर मैंने उनसे कहा- आप खाना खा लें।

पर वो तो बाहर का खाना नहीं खाते थे और इतनी रात को कोई फल की दुकान भी नहीं खुली थी, सो उन्होंने भी मना कर दिया।

बस वेटर को पानी लाने को कह दिया।

कमरे में बिस्तर बस एक इंसान के सोने भर का था, बगल में एक छोटी सी अलमारी थी और उसी में एक बड़ा सा आइना लगा था, बगल में एक कुर्सी थी।

हमने अपने साथ लाए हुए बैग में सोने के लिए सामान निकाला और फिर उसे अलमारी में रख दिया।

उन्होंने कहा- बिस्तर बहुत छोटा है, तुम बिस्तर पर सो जाओ, मैं कुर्सी पर सो जाऊँगा। एक रात किसी तरह तकलीफ झेल लेते हैं।

मैंने उनसे कहा- बाकी लोगों को फोन कर के बता दें कि यहाँ क्या हुआ है।

पर उन्होंने कहा- सुबह बता देंगे.. रात बहुत हो चुकी है, बेकार में सब परेशान होंगे।

मैं बिस्तर पर लेट गई और वो कुर्सी पर बैठ गए, काफी देर हो चुकी थी।

मैं देख रही थी कि वो ठीक से सो नहीं पा रहे थे सो मैंने कहा- आप बिस्तर पर सो जाएँ और मैं नीचे कुछ बिछा कर सो जाती हूँ।

तब उन्होंने कहा- नहीं, नीचे फर्श ठंडा होगा, तबियत ख़राब हो सकती है। मैं यहीं कुर्सी पर सोने की कोशिश करता हूँ।

बहुत देर उन्हें ऐसे ही उलट-पुलट होते देख कर मैंने कहा- आप भी बिस्तर पर आ जाएँ, किसी तरह रात काट लेते हैं।

कुछ देर सोचने के बाद वो भी मेरे बगल में आ गए।

मैं तो यही सोच रही थी कि बुजुर्ग इंसान हैं और मैं दीवार की तरफ सरक के सो गई और वो मेरे बगल में लेट गए।

मैं लगभग नींद में थी कि मुझे कुछ एहसास हुआ मेरी टांगों में और मेरी नींद खुल गई।

मैं कुछ देर यूँ ही पड़ी रही और सोचने लगी कि क्या है, तो मुझे एहसास हुआ कि वो अपना पैर मेरे जाँघों में रगड़ रहे हैं।

मैं एकदम से चौंक गई और उठ कर बैठ गई।

मैंने कहा- आप यह क्या कर रहे हैं?
कहानी जारी रहेगी।
अपने प्यार भरे ईमेल मुझे भेजें।

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