प्रेम और वासना

प्रेम और वासना

यह तब की कहानी है.. जब मैं 12 वीं कक्षा में था.. कोचिंग में मेरी एक फ्रेंड थी.. जिसे मैं बहुत पसंद करता था। वो भी मुझे पसंद करती थी.. लेकिन ये बात मुझे काफी बाद में पता चली।
हम लोग अक्सर जाते-आते बात कर लिया करते थे.. वैसे तो उसका फिगर बहुत ही बढ़िया था.. लेकिन चूंकि मैं उसे मन से चाहता था.. तो कभी उस तरफ ध्यान नहीं गया।

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एक दिन मैं कोचिंग जल्दी चला गया.. तो देखा कि वो भी वहीं बैठी है। मैं उसके सामने वाली बेंच पर जाकर बैठ गया, मैंने उससे पूछा- हाय.. आज तुम जल्दी कैसे आ गई?
उसने कहा- कुछ नहीं.. बस यूँ ही.. आज घर पर मन नहीं लग रहा था।
मैंने पूछा- क्यों.. कुछ खास बात?
वो बोली- नहीं.. कुछ खास तो नहीं।

मुझे उसकी आँखों में दिख रहा था कि वो किसी बात को लेकर परेशान है, मैंने उससे कहा- घबराओ नहीं.. मुझसे शेयर कर सकती हो।

थोड़ी ना-नुकुर के बाद उसने बताया कि उसका कोई ब्वॉय-फ्रेंड था.. जिससे उसका हाल ही में ब्रेक-अप हुआ है.. इसीलिए थोड़ी परेशान है।

मैंने उसे समझाते हुए कहा- देखो थोड़ा बहुत झगड़ा तो आम बात है.. लेकिन बात अगर बड़ी हो.. तो फिर ब्रेक-अप कर लेना ही ठीक होता है।
इस समय मैं दुखी था.. क्योंकि मुझे पता चल गया था कि उसका एक ब्वॉय-फ्रेंड था.. लेकिन साथ ही खुश भी था क्योंकि उसका ब्रेक-अप हो चुका था।

हालाँकि इस बात पर खुश होना थोड़ा अजीब लग रहा था.. क्योंकि मैं उसका दोस्त भी था। लेकिन अजीब सी सिचुएशन थी वो.. आप समझ ही सकते हैं।
बहरहाल मैंने उसे थोड़ी सांत्वना दी और अपना नम्बर दिया और कहा- कभी भी अकेलापन महसूस हो.. तो बात कर लेना। फिर मैं चुपचाप अपने काम में लग गया क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वो मेरे सामने रोए।

फिर कुछ दिन इसे ही कटे, हम लगभग रोज़ कोचिंग पर मिलते रहे और अब बातें ‘हाय-हैलो’ से कुछ ज्यादा होने लगीं। शायद उस दिन उसकी फीलिंग्स को महसूस करके उसे सांत्वना देना मेरे काम आया।
फिर एक दिन अचानक मेरे मोबाइल पर एक अनजान लैंडलाइन नम्बर से फ़ोन आया। मुझे पहले तो लगा कि पता नहीं किसका कॉल है.. इसलिए मैंने नहीं उठाया.. पर दूसरी रिंग पर मैंने फोन उठाया.. और कहा- हैलो..

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उधर से एक प्यारी सी आवाज़ आई- मैं..
उसकी आवाज सुनते ही मैं पहचान गया कि यह वही कॉल है.. जिसका इंतज़ार मैं न जाने कितने दिनों से कर रहा था।
फिर उसने कुछ पढ़ाई के बारे में पूछा।
मैंने कहा- बढ़िया चल रही है..

काफी देर तक बातें हुईं.. मैंने उसकी भी खोज खबर ली।
पहले वो चुप सी हो गई.. तो जैसे ही मैंने पूछा- क्या हुआ?
तो वो ‘फफक’ कर रो पड़ी।
मैं उसको चुप कराने लगा। मुझे बहुत बुरा लग रहा था। लेकिन कर भी क्या सकता था।

जैसे-तैसे जब उसको चुप कराया.. तब वो बताने लगी कि उसके ब्वॉय-फ्रेंड ने उसे हमेशा के लिए छोड़ दिया है और वो बहुत अकेला महसूस कर रही है.. इसलिए मुझसे मिलना चाहती है।

मैंने कहा- तुम बस बताओ कि मिलना कहाँ है।
उसने कहा- मैं तुमसे अपने घर पर ही मिलूँगी क्योंकि बाहर मेरे पापा या मम्मी ने देख लिया तो दिक्कत हो जाएगी।
मैंने कहा- ठीक है.. अपना पता बताओ।
उसने बताया और मैंने नोट किया।

उस समय तो बात करने में देखा नहीं लेकिन जब बाद में देखा तो याद आया कि ये पता तो उस जगह का है.. जो मेरे घर से करीब 7-8 किलोमीटर दूर थी।
उस समय मेरे पास बस साइकिल हुआ करती थी।

खैर.. मेरी जान के लिए मैं इतना तो कर ही सकता था। मैं करीब 20 मिनट में उसके घर पहुँच गया।

उसने मुझे अन्दर बुलाया और पानी पीने के लिए दिया, पानी पीकर मैंने उससे पूछा- अब कैसी हो?
तो वो मेरे थोड़े करीब बैठ गई और धीरे से मेरा हाथ थाम लिया। मैंने भी उसका हाथ धीरे से पकड़ा।

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उसने कहा- अब क्या कहूँ.. जिस पर सबसे ज्यादा विश्वास था.. वो ही विश्वास तोड़ गया.. और तुम साथ हो जबकि मुझे ठीक से जानते भी नहीं।
मैंने कहा- कोई बात नहीं.. ऐसा तो सबके साथ हो ही जाता है। प्यार चीज़ ही ऐसी है.. जिसे मिले.. उसे कदर नहीं होती और मेरे जैसे जिन्हें कदर होती है.. वो बस इंतज़ार के लम्हे काटते हैं।

उसने पूछा- मतलब.. क्या तुम भी किसी को चाहते हो?
मैंने कहा- हाँ.. चाहता तो बहुत हूँ..
उसने पूछा- कौन है वो खुशनसीब?
मैंने कहा- तुम तो उसे बहुत करीब से जानती हो।
उसने कहा- अच्छा जी.. तो नाम ही बता दीजिए।
मैंने कहा- नाम तो क्या.. मैं तो तुमको उससे मिलवा सकता हूँ..
उसने पूछा- ऐसा.. तो कब मिलवा रहे हैं?
मैंने कहा- अभी मिलवा सकता हूँ.. लेकिन उसके लिए अपनी आँखें बंद करनी होगीं.. और मेरे साथ चलना होगा..
वो थोड़ा घबराई.. तो मैंने कहा- भरोसा रखो.. चेहरे से दिखता होगा.. लेकिन मैं इतना बुरा नहीं हूँ..

इस पर वो थोड़ा हँसी और अपनी आँखें बंद कर लीं। मैंने उसका हाथ तो थामा ही था.. उसे ले जाकर उसके घर के आईने के सामने खड़ा कर दिया।

उसने जैसे ही अपनी आँखें खोलीं.. वैसे ही खुद को अपने ही सामने खड़ा पाकर जैसे अपनी ही छवि को नया-नया सा महसूस करने लगी।

उसने पूछा- क्या.. क्या.. सच में??
मैंने कहा- कोई शक हो.. तो मेरे दिल से पूछ लो.. मैं तो कब से तुम्हें बेपनाह चाहता हूँ।

इतना कहना था कि वो मुझसे लिपट कर रोने लगी।
मैंने उसे शांत करने की पूरी कोशिश की और उसे मेरी यही बात सबसे अच्छी लगती थी।

अब बस हम दो प्रेमी एक-दूसरे के बाहुपाश में जकड़े थे। इसकी बाद क्या होने लगा.. न उसको होश था.. न मुझे..
इसी सब के बीच उसने मेरे होंठों को चूम लिया और हम करीब 10 मिनट तक इसी तरह आलिंगनबद्ध होकर एक-दूसरे को चूमते रहे।
न वक़्त का होश.. न जगह का ख्याल..

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यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं !
बस चूमना जारी रहा.. क्या अद्वितीय अनुभूति थी वो.. पूरी दुनिया से परे होकर किसी एक में समा जाना.. ना जाने किससे… पर सुरक्षित महसूस हो रहा था।

यूँ ही चूमते-चूमते ही हम उसके सोफे पर लेट गए और मैंने उसके रसीले होंठों के अलावा भी दूसरे अंगों का रस लेना शुरू किया। फिर धीरे से उसके टॉप को कंधों से सरकाया और उसके कंधों को बेतहाशा चूमने लगा।

उसे कुछ भी होश नहीं था कि क्या हो रहा है.. जैसे वो किसी और ही दुनिया में हो.. जहाँ उसके साथ सिर्फ मैं हूँ और वो है.. तीसरा कोई नहीं..

इतने में ही उसे याद आया कि उसकी माँ.. जो कि उस समय नौकरी करती थी.. वापिस आने वाली होंगी। तो उसने मुझसे जाने का अनुरोध किया।
मेरा मन तो उस जगह से टस से मस भी होने का नहीं हो रहा था.. लेकिन नया-नया प्यार था और पकड़े जाने का डर भी था.. तो मैं वापिस चला आया अपने 8 KM के सफ़र पर..

आगे हमारे प्यार की पींगें बढ़ती रही और फिर उसके तन का मिलन मेरे तन से हो गया। दोस्तों मैं उससे बेहद प्यार करता हूँ और उसके साथ हुए शारीरिक संबंधों का जिक्र करना उचित नहीं समझता हूँ।
उनका जिक्र तो आपको अन्तर्वासना की बहुत सी कहानियों में रस पूर्ण तरीके से मिल ही जाएगा।

आपके ईमेल की प्रतीक्षा रहेगी।
[email protected]

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