मेरी कामुकता का राज-1


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मेरी कामुकता का राज-1

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दोस्तो, मैं आपकी सहेली ममता, अभी मेरी पिछली कहानी
मेरे बदन की कामुकता का इलाज
में आपने पढ़ा कि कैसे मैंने अपने ऑफिस के कुलीग वरिंदर उर्फ़ वीरू से चुदवाया और अपने जिस्म की प्यास को उसका लंड लेकर बुझाया।
मगर ये प्यास ऐसी नहीं है कि जो एक बार चुदने से बुझ जाए। मेरे पति जो थे, वो बहुत ही धार्मिक विचारों वाले थे और मैं बहुत ही कामुक।
आप को बताऊँ कि जब से मैंने होश संभाला है, तब से ही मैं अपने जिस्म से खेलती आई हूँ। पहले अक्सर मैं अपनी चूत को जब छूती तो मुझे एक अजीब सा आनन्द मिलता।

एक बार मैं अपने ननिहाल गई हुई थी, तब एक गर्मी की दोपहर मैंने अपनी मामा और मामी को कुछ करते हुये देखा। हम सब बड़े हो चुके थे लेकिन इतने मासूम थे कि छुप्पा छुपी खेल रहे थे, जब मैं जाकर अपने मामा के कमरे में पर्दे के पीछे छुप गई थी।
मेरे छुपते ही मामा कमरे में आए और अपनी बनियान पायजामा उतार दिये, सिर्फ चड्डी पहने बेड पे लेट गए। उनकी चड्डी न जाने क्यों ऊपर को उठी हुई थी।

इतने में मामी भी अंदर आई, उन्होंने कमरे का दरवाजा बंद करके सिटकनी लगा दी और दरवाजे के पास खड़े ही उन्होंने फिल्मी गाने गाते हुये, अपनी साड़ी खोलनी शुरू कर दी, बेड तक पहुँचते पहुँचते उन्होंने अपनी साड़ी उतार दी।
मामा ने उनकी बाजू पकड़ी और अपने ऊपर गिरा लिया।

मैं पर्दे के पीछे छुपी सब कुछ देख रही थी।

मामी ने अपना पेटीकोट ऊपर उठाया और मामा के पेट पर चढ़ कर बैठ गई। मामा ने खुद मामी के ब्लाउज़ के बटन खोले उनका ब्लाउज़ और ब्रा उतार दिया और फिर मामी के पेटकोट का नाड़ा खोला।
जब मामी खड़ी हुई, तो मामी का पेटीकोट नीचे गिर गया और मामी बिल्कुल नंगी हो गई।

मैं छुपी खड़ी सोच रही थी कि ये लोग नंगे क्यों हो रहे हैं।
मगर दोनों बहुत खुश थे, आपस में धीरे धीरे फुसफुसा कर बातें कर रहे थे, जो मुझे समझ में नहीं आ रही थी।

फिर मामी ने अपना पेटीकोट उठा कर एक तरफ रखा और मामा की चड्डी खींच कर उतार दी, दोनों बहुत हँसे। मुझे भी हंसी आई मगर मैंने अपनी हंसी को दबा लिया।
चड्डी के नीचे से मामा का वो देखा, काला सा, गंदा सा, मगर कितना बड़ा था वो। मामी ने उसे हाथ में पकड़ा और फिर अपने मुँह में ले लिया।

मुझे बड़ा अजीब लगा “हे भगवान, मामी कितनी गंदी हैं, कितनी गंदी सी चीज़ को अपने मुँह में ले गई.” मैंने सोचा।

मगर वो तो उसे बड़े प्यार से ऐसे चूस रही थी, जैसे मैं लोलीपॉप चूसती हूँ।

मामा ने अपना पाँव मामी की कमर पे मारा तो मामी उसको चूसते चूसते घूम गई और अपनी सुसू वाली जगह उन्होंने मामा के मुँह पर रख दी। मैंने देखा कि मामा भी उसे चाटने लगे।
बहुत ही अजीब बात थी ये, वो दोनों एक दूसरे की सुसू वाली जगह को क्यों चाट रहे हैं।
मगर इस सब को देख कर मुझे भी कुछ कुछ अजीब सा हो रहा था।

उसके बाद बाद मामी नीचे लेट गई, मामा उनके ऊपर लेट गए, मामा ने अपना वो गंदा सा सुसू मामी की गोरी गोरी सुसू में डाल दिया।
मैं तो एक बार काँप गई, इतना मोटा और लंबा वो, मामी ने कैसे ले लिया, मेरे अंदर जाए तो मैं तो मर ही जाऊँ।
मगर मामी तो खुश थी.

कितनी देर वो ऐसे ही आपस में हँसते रहे और हिलते रहे।

फिर मामा ने एकदम अपना वो काला सा सुसू बाहर निकाला और मामी के पेट पर सफेद सा गाढ़ा गाढ़ा सुसू कर दिया, जैसे गोंद होती है कागज चिपकाने वाली।
उसके बाद दोनों उठे, कपड़े पहने और चले गए। मैं फिर भी वहीं खड़ी रही। मैंने अपनी स्कर्ट ऊपर उठाई, अपनी चड्डी में हाथ डाल कर अपनी सुसू को छू कर देखा, उसमें से भी पानी सा निकल रहा था, मगर ये सुसू नहीं था, गाढ़ा और चिपचिपा सा था।

मैं एकदम से पर्दे से बाहर निकली और बाहर को भागी, मगर दरवाजे के पास ही मुझसे मामा टकरा गए। उन्होंने मेरी बाजू पकड़ी- अरे मम्मो (सब मुझे प्यार से मम्मो ही पुकारते हैं) तू कहाँ थी? मैंने कहा- मैं तो अंदर छुपी थी.
और अपनी बांह छुड़वाने की कोशिश की।
तो मामा ने पूछा- कब से अंदर थी?
मैंने कहा- कब की।
वो बोले- तो तूने कुछ देखा?
मैं बोल नहीं पाई, मगर सर हिला कर हाँ कर दी।

मामा मुझे अपने कमरे में ले गए, मुझे अपने सामने खड़ा कर लिया, बोले- बता क्या देखा?
मैंने कहा- मुझे जाना है.
मुझे डर था, कहीं मामा अपना काला सा सुसू मेरी सुसू में न डाल दें।
वो बोले- चली जा, पर बात सुन किसी को बताना नहीं, ठीक है, मेरी प्यारी मम्मो!
और मामा ने मुझे 2 रुपये दिये, मैं खुश होकर दौड़ती हुई बाहर चली गई।

मगर उस दिन मुझे सेक्स का ज्ञान मिल गया, मैं समझ गई के सेक्स क्या होता है, लड़का लड़की क्या करते हैं। सुसू सिर्फ सुसू करने के लिए नहीं होती, इसको लड़के लोग चाटते हैं, लड़कों का सुसू लड़कियाँ अपने मुँह में लेकर चूसती हैं।
धीरे धीरे मुझे सुहागरात, सेक्स, रे प जैसे सभी शब्दों का मतलब समझ आने लगा और मैं सब कुछ जान चुकी थी।

तब तो मेरे बूब्स भी बन गए थे, मैं अक्सर रात को सोने से पहले अपने बूबू सहला कर देखती, अपनी सुसू को सहलाती, उसमें अपनी उंगली मैं पूरी डाल लेती थी।
एक बार पड़ोस के एक लड़के को मैंने अपने पास बुलाया, और उसके साथ डॉक्टर डॉक्टर खेलने लगी। उसे मरीज बना कर चेकअप के लिए उसकी पैन्ट उतरवाई, और उसकी सुसू को छेड़ने लगी। मेरे छेड़ने से ही उसकी सुसू अकड़ गई, जो मेरी उंगली से थोड़ी बड़ी थी।
मैंने उसे कहा- ऐसा कर, इसको इसमें डाल।

मैंने अपनी सलवार उतार कर उसको अपनी सुसू दिखाई। उसने कोशिश कर मगर पता नहीं क्यों उसकी सुसू मेरी सुसू में नहीं गई। उसके बाद भी हम दो तीन और कोशिश करते रहे मगर हर बार असफल ही रहे। फिर वो लड़का हमारे घर खेलने नहीं आया, और मेरा अरमान अधूरा रह गया, और मैं फिर से अपनी उंगली ही डाल कर हिलाती।

मगर जब मुझे झनझनाहट सी ज़्यादा होती तो मैं ये छोड़ देती। उस वक़्त तक मुझे पता ही नहीं था कि मैं हस्तमैथुन कर रही हूँ, और वो भी पूरा नहीं करती, आधा बीच में ही छोड़ देती हूँ। फिर

एक दिन मेरी ही एक सहेली से जब मैं बात कर रही थी, तब उसने बताया- अगर उंगली अंदर डाल कर आगे पीछे करती है, तो रुका मत कर, जब तक कर सकती है, करती रहा कर, फिर बाद में बड़ा मज़ा आता है।
मैं फिर भी नहीं समझी, तो उसने एक दिन मुझे अपने घर बुलाया, हम पढ़ने के लिए उसके घर में छत पे बने कमरे में चली गई। वहाँ उसने अपनी सलवार उतार कर दिखाई- इसे चूत कहते हैं.

मैंने फिर उसे अपने मामा मामी वाली सारी कहानी सुनाई तो वो बोली- वो जो तेरा मामा कर रहा था उसे चुदाई कहते हैं। तेरे मामा ने अपने लंड से तेरी मामी की चूत मारी थी।
मैंने पूछा- वो क्यों मारी?
वो बोली- इससे उन दोनों को मज़ा आता है। जैसे तुझे अपनी चूत में उंगली करने से मज़ा आता है।
मैंने कहा- पर मामा और मामी तो तो एक दूसरे की सुसू मेरा मतलब है कि चूत को चाट भी रहे थे।
वो बोली- इसमे भी बड़ा मज़ा आता है, चल मैं तुझे करके दिखाती हूँ।

उसने मेरी सलवार और चड्डी उतार दी, फिर अपनी एक उंगली मेरी चूत पर रखी और अंदर डालने लगी, मैं तब भी गीली गीली हो रही थी, उसकी उंगली अंदर चली गई, तो वो अपनी उंगली अंदर बाहर करने लगी। सच में इसमे तो जैसे मैं खुद करती थी, उससे भी ज़्यादा मज़ा आ रहा था।

फिर उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी चूत पर रखा और बोली- चल अपनी उंगली डाल और तू मेरा कर!
मैं वैसे ही करने लगी।
दोनों सहेलियाँ एक दूसरे को मजा देने लगी। मजा बढ़ता गया तो हमारी उंगली करने की स्पीड भी बढ़ती गई।

और फिर जैसे मेरी जान ही निकल गई हो, मेरा पूरा बदन अकड़ गया, सर से पाँव तक सनसनी दौड़ गई, मुझे नहीं पता क्यों, पर मैंने खुद ही उसकी चूत को मुँह लगा दिया और उसकी चूत को चाट गई।
क्यों मुझे उसकी चूत चाटना इतना अच्छा लगा। मैंने कभी अपनी चूत में डाली हुई उंगली नहीं चाटी थी, मगर अब मैं उसकी चूत को अपनी जीभ से चाट गई। सारा मुँह मेरा नमकीन स्वाद से भर
गया।

करीब एक मिनट तक मैं ऐसी हालत में रही, सांस तेज़ चल रही थी, दिमाग में गिटार बज रहा था, जैसे बुखार में बजता है। चूची मेरी सख्त हो गई थी।
जब मेरी जान में जान आई, तो पायल बोली- क्यों, कैसा मजा आया?
मैंने कहा- पूछ मत यार, जान निकल गई हो जैसे!

पायल बोली- तूने तो बिना कहे ही मेरी चाट ली?
मैंने कहा- मुझे पता ही नहीं चला, कब मेरा मुँह अपने आप तेरे वहाँ जा लगा।
उसके बाद पायल के कहे अनुसार मैंने उसका भी हस्त मैथुन किया।

अगले हफ्ते तक ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा और अब हम दोनों सहेलियाँ उंगली से नहीं करती थी, हम अपनी चूत में कुछ और बड़ी और मोटी चीज़ लेती थी, जो पहले से ज़्यादा टाईट अंदर जाए, और मज़े के साथ साथ दर्द भी दे।
जब पानी गिराना होता था, तो हम दोनों सिर्फ अपनी जीभ से एक दूसरे की चूत चाटती, और दोनों स्खलित होती।

मेरी रियल सेक्स स्टोरी जारी रहेगी.
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मेरी कामुकता का राज-2

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