एक व्याख्या प्रेम की…-1

एक व्याख्या प्रेम की…-1

लेखक : निशांत कुमार

वासना और प्रेम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रेम का सुख मिल जाए तो वासना मनुष्य के नियंत्रण में हो जाती है और जिस्म का सुख मिल जाए तो प्रेम पीछे छूटने लगता है।

मैं जो कहानी सुनाने जा रहा हूँ वो इन्ही दो शब्दों के बीच है, वासना की आग बड़ी है या प्रेम की सौगात, यही समझने की कोशिश है इस कहानी में !

यह कहानी सत्य है काल्पनिक, यह निर्णय मैं आप पर छोड़ता हूँ क्योंकि कभी कभी सत्य भी काल्पनिक लगने लगता है और प्रेम से बड़ा धोखा तो शायद ही इस संसार में कोई और है।

यह कहानी है पुष्प की ! हाँ, उसका नाम पुष्प था, जैसा नाम वैसा ही स्वरूप ! उसे देख के अक्सर मैं पारिजात वृक्ष के पुष्पों की कल्पना में खो जाता था। कहते हैं देवताओं का शृंगार इन्हीं पुष्पों से होता है। उसका एक एक अंग में जैसे उसी पुष्प की निर्मलता बसी हुई थी। रंग उसका सांवलेपन और गौर वर्ण के बीच का था, 18 की अवस्था थी और इस उम्र के अनुसार कुछ ज्यादा ही परिपक्व थी। उसकी आँखें अगर कोई एक बार देख ले तो उसके सम्मोहन से कभी निकलना ही ना चाहे। उसके सुर्ख गुलाबी अधर जिसके निचले भाग जरा ज्यादा विकसित थे उस पर जब पानी की बूँदें रह जाती थी तब उस जल की एक बूंद के लिए अमृत का त्याग भी संभव लगता। उसके गले और घने गेसुओं का वो मिलन स्थल जिसे यौन क्रिया में स्त्री की ख़ास जगह का दर्जा प्राप्त है, उसमें से आती हुई खुशबू किसी को भी अपना दीवाना बना ले। उसके वो दो अमृत कलश इतने नाजुक लगते थे मानो कहीं छूने मात्र से कहीं अमृत छलक ना जाये।

नाभि ऐसी कि अप्सराएँ भी ईर्ष्या करें, कटि प्रदेश तक आते आते ऐसा मालूम होता है कि सफ़र जिसकी शुरुआत इतनी आनन्ददायक थी उसका अंत ऐसा ही होना चाहिए।

हल्के हल्के रेशमी रोयें जो एक नाज़ुक कवच बना घेरे रहते थे उस पुष्प के रक्तिम पुष्प को, जरा सा ऊपर करने पर नीचे तीसरे द्वार पे उँगलियाँ फिराना ऐसा लगता मानो स्वर्ग के द्वार पे खड़ा मनुष्य अन्दर जाने से इन्कार कर रहा हो… ऐसा लगता है जैसे उसके जिस्म को शब्द में बाँध पाना संभव ही नहीं है।

एक बार फिर मैं पटना पहुँचा। इस बार मैं अपने अंकल के यहाँ रूका था। लगातार दो परीक्षाएँ थी तो इस बार पूरे एक हफ्ते यहीं रूकना था। चेहरे पर उदासी और मन में पिछली बार की याद संजोये यूँ ही अंकल के घर से बाहर टहलने निकला, रह रह कर अपनी पुरानी यादों में डूबा जा रहा था, मन लग नहीं रहा था तो ऑटो से गंगा नदी के किनारे एक छोटे से घाट पर पहुँचा। नदी किनारे से काफी दूर थी, फिर भी शायद मेरी आस्था या संस्कार जो बिना गंगा नदी के जल का स्पर्श किये रह न सका, धीरे धीरे नदी के करीब पहुँच कर उसके जल को छूकर और अपने हाथ पांव धोकर वापिस आने लगा तभी एक किश्ती के मेरे करीब आने की आवाज़ सुनाई दी मेरे पीछे एक नाव आकर रुकी।

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मल्लाह ने पूछा- नदी पे सैर करना है भैया?

मेरा मन वैसे भी नहीं लग रहा था, मैं हाँ कह कर उसकी नाव पर चढ़ गया। कुल दस लोगों की जगह थी और मैं अकेला था। ऐसा लग रहा था जैसे पूरी दुनिया में मैं ही अकेला हूँ…

थोड़ी देर में नाविक ने कश्ती को दूसरे तट पर रोक दिया और दूसरे ग्राहक खोजने लगा।

मैं चुपचाप नदी की धार को देख रहा था, अचानक एक आवाज़ ने मेरा ध्यान भंग किया, जैसे ही पलटा, मेरी नज़र उस आवाज़ के स्रोत पर गई। ढलते हुए सूरज की रोशनी में चाँद को देखने जैसा नजारा था।

वो अपने पूरे परिवार के साथ आई हुई थी। दिल में बसी वो पुरानी यादें मानो कहीं खो सी गई, अब तो जैसे मुझे मेरी मंजिल ही मिल गयी थी। वो अपने सारे परिवार को सहारा देकर चढ़ा रही थी और उसके कूल्हे मेरी वासना बढ़ा रहे थे…

एक छन में प्रेम और दूसरे ही पल वासना !

यही जीवन है।

अब पूरे सात लोग हो गए थे और कहीं दूसरा ग्राहक मिलने के आसार नहीं थे तो खेवट ने सैर की शुरुआत की। उसी परिवार का एक लड़का मेरी बगल वाली सीट पर बैठ गया था और उसके बगल में पुष्प.. अपनी वासना से उत्प्रेरित भावना को संयमित करने के लिए मैं दूसरी तरफ देख रहा था कि तभी ढेर सारी पानी की बूँदें मेरे चेहरे और कपड़ों पे आ गिरी। मैं कुछ कहता, उससे पहले उस परिवार के मुखिया ने मुझसे माफ़ी मांगी और उसे डांटने लगा।

मैंने फिर खुद को संयमित कर उनसे कहा- रहने दीजिये कोई बात नहीं..

फिर बगल वाले लड़के ने हाथ बढ़ाते हुए मुझसे कहा- मेरा नाम आकाश है, और आपका?

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मैंने उत्तर में अपना नाम बताया ‘निशांत’

उसने फिर पूछा- नए लगते हो इस शहर में? कहीं और के हो क्या..?

मैंने जवाब दिया- हाँ, मैं इम्तिहान देने के लिए आया हूँ।

फिर मेरे इम्तिहान का नाम बताने के साथ ही वो बोल पड़ा- यही परीक्षा तो मेरी भी है कल !

और हम दोनों का एग्जामिनेशन सेंटर एक ही था।

इत्तेफाक भी बड़ी अजीब चीज ही होती है। फिर उसके पिता मुझसे मेरी तैयारी के बारे में पूछने लगे।

मैंने कहा- मेरा पिछली बार पीटी हो चुका था, इस बार आगे की सोच रहा हूँ।

तभी मेरा फ़ोन बज गया, घर से पापा का कॉल था।

बात करके मैंने जैसे ही फ़ोन रखा, बगल से मीठी आवाज़ आई- आप ग़ज़ल के दीवाने लगते हो !

मेरे रिंगटोन में जगजीत सिंह की ग़ज़ल सेट की हुई थी।

मैंने जवाब में कहा- हाँ, मेरा पूरा मेमोरी कार्ड ग़ज़लों से भरा पड़ा है।

फिर उसने भी हाथ बढ़ाते हुए कहा- मेरा नाम पुष्प है !

मेरी नज़रें तो जैसे उसके उभारों पर ही टिकी हुई थी। अचानक उसके दुबारा बोलने पर मैंने भी अपना हाथ बढ़ा दिया- निशांत..

मेरे हाथ अब तक काँप रहे थे।

पुष्प ने यह सब भांप लिया था, मेरी नज़रें जैसे नीची हो गई थी।

तभी आकाश ने मुझे अपने घर पर आकर रात में साथ में तैयारी करने की पेशकश की।

अब तो जैसे वासना ने मुझे अपने बस में ही कर लिया था, मैं कोई नहीं मौका छोड़ना नहीं चाहता था, मैंने हाँ कर दी।

पुष्प यह सब झुकी झुकी नज़रों से देख रही थी। आकाश ने मेरा नंबर लिया।

अब मैं घर आ चुका था और बस अपनी वासना पूर्ति के सपने देख रहा था। पता नहीं कब मेरी आँख लग गई… सामने पुष्प अपनी खुले हुए गेसुओं और एक पतले से जालीदार आवरण में थी शाय।द मैं स्वप्न में था… अब जो भी था, मैं तो बस उसे पाना चाहता था…

मैंने बस उसे अपनी बांहों में जकड़ लिया। हवस मुझ पर पूरी तरह से हावी हो चुकी थी। उसके होठों को चूमते हुए ऐसा लग रहा था मानो फिर कब ये होठ मिलें !

मेरी जीभ उसके होंठ और मुख में ऐसे धंसी जा रही थी कि उसकी आवाज़ घुटने लगी थी। होठों को उसके होंठों से सटाए ही मेरे हाथ उसके वक्ष पर गए। एक ही झटके में मैंने उसकी काया पर पड़ी आवरण-छाया को खींच कर नख-शिखर तक वस्त्ररहित कर दिया।

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उसने जबरन मेरे होठों को अपने होठों से अलग किया, मैंने हांफते हुए उसे पलट दिया और उसकी पीठ पर चुम्बनों की बरसात कर दी, उसे गोद में उठा कर मैंने उसे बिस्तर पर पटक दिया।

सफ़ेद चादर पर पुष्प का जिस्म किसी कलाकार की महानतम कला होने का भ्रम दे रहा था। अपने कपड़े उतार मैं उस पर टूट पड़ा उसके कूल्हों को जैसे मैं खा जाने पर उतारू था मेरी उँगलियाँ उसके मल द्वार में धंसी जा रही थी, मेरे दांत रह रह कर उन मखमली कूल्हों पर आघात कर रहे थे। फिर उसे पलट कर उसके उरोजों को कस कर अपनी हथेलियों में भर लिया। मैं तो जैसे सारा रस अभी ही निकालने पर उतारू था। उसके स्तनों पर अपने होठों को लगा दिया और ऐसे पीने लगा मानो जन्मों जन्मों का प्यासा हूँ। फिर से मैंने अपने होंठ उसके होंठों पे लगा दिए।

अब मैं मुख मैथुन की अवस्था में उसके मुख के पास अपना लिंग ले गया और अपने पैरों से उसके हाथ रोक के उसके मुख में अपना लिंग डालने लगा। एक बार तो ऐसा लगा जैसे मैं अपना समूचा लिंग भी अन्दर दे रहा हूँ तो भी उसे कोई तकलीफ नहीं हो रही है।

फिर मैं उसकी दोनों टांगो के बीच आ गया और उसकी योनि को मुट्ठी में भर कर थोड़ा ऊपर किया और एक जबरदस्त वार, समूचा लिंग उसके अन्दर था, दोनों हाथ उसके स्तनों को मसल रहे थे और मैं बस धक्के पे धक्के लगाये जा रहा था।

लिंग अन्दर किये हुए ही मैंने उसे पलट दिया, उसके मॉल द्वार को देखते हुए योनि का भेदन एक नया ही एहसास था। अब मैं अपनी हवस के चरम पर था। मैंने थोड़ा झुक कर उसके मुंह को अपने हाथों से बंद कर दिया और पूरी ताकत से लिंग उसके मल द्वार में डाल दिया।

दो झटकों के बाद मुझे मेरे लिंग के आस पास गरम तरल सा महसूस हुआ।

तभी मेरी आँख खुल गई… मैं स्खलित हो गया था और मेरे अन्दर का तूफ़ान शांत हो चुका था…

आगे की कहानी अगले भाग में..

निशांत कुमार

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