विलेज के मुखिया का बेटा और शहरी छोरी-3

विलेज के मुखिया का बेटा और शहरी छोरी-3

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मेरी चोदन कहानी के पिछले भाग
विलेज के मुखिया का बेटा और शहरी छोरी-2
में आपने पढ़ा कि मैं अपनी सहेली के साथ उसके गाँव गयी थी. वहां पर गाँव के मुखिया के बेटे राघव से मिलवाया मेरे सहेली ने!
मुझे सपनों में भी राघव जी दिखाई दे रहे थे कि एक ही मुलाकात में मैं उनके प्रति सम्मोहित हो गयी थी.

मैं और मेरी सहेली मन्दिर के तालाब में पूरी नंगी होकर नहा रही थी कि राघव जी अपने एक दोस्त के साथ आ गए.
वे दोनों भी पूरे नंगे होकर हमारे साथ नहाए आ गए.
अब आगे:
मिताली की तरफ देखा तो वो एक कोने में घुटनों के बाल बैठ कर चंदू का लंड मजे से चूस रही थी।
मैंने झट से शर्मा कर मुँह दूसरी तरफ घुमा दिया और राघव जी की तरफ पीठ कर के खड़ी हो गई।

“वो तो शर्म से लाल हो गयी है राघव… अब आप ही कुछ करो!” चंदू दूर से चिल्ला कर बोला।

उसकी यह बात सुन कर मैं अपने आप ही एक हाथ से मेरे मम्मे और एक हाथ से मेरी चुत छुपाने की कोशिश करने लगी; मेरे दिमाग ने काम करना छोड़ दिया था; मैं आप अपने शरीर पर राघव जी के स्पर्श का इंतजार कर रही थी।
पर वो थोड़ी देर तक मेरे पीछे की सुंदरता को निहारते रहे।

फिर अचानक मुझे मेरे नितम्बों पर उनके हाथों का स्पर्श महसूस हुआ। उनका टच होते ही मैंने अपनी आंखें जोर से बंद कर ली, मेरा शरीर अब कंपन कर रहा था, मुझे क्या हो रहा है कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।
उनकी एक उंगली मुझे मेरी गांड पे पास घुसती महसूस हुई, थोड़ी ही देर बाद उनकी उंगली मेरी नाजुक गांड के छेद को सहला रही थी।

मेरे शरीर ने प्रतिक्रया की और गान्ड के छेद को और टाइट कर दिया, तभी उनकी उंगली मुझे मेरी छेद के अंदर जाती महसूस हुई। मुझे हल्का सा दर्द हुआ और मैं दर्द से कराह उठी, मैंने अपनी चुत पर से हाथ हटाकर राघव जी का हाथ पकड़ लिया, पर उनकी ताकत मुझसे ज्यादा थी।

मुझे दर्द होता देख राघव जी ने अपनी उंगली मेरी गांड से निकाल ली लेकिन अपने दोनों हाथ आगे लाते हुए उन्होंने मेरे मम्मों पे कब्जा कर लिया। वो मेरे दोनों मम्मों को अपने दोनों हाथों से सहलाने लगे। जैसे ही उन्होंने मेरे दोनों निप्पल्स को अपनी उँगलियों में लेकर के दबाया, मैंने तालाब की दीवार को हाथों से पकड़ते हुए ऊपर देख कर “आहहहहह…” कर सिसकी भरी।

“कल जब गाय का दूध निकाल रहे थे तब तो चाव से देख रही थी?”
राघव बोले, वे अब मेरे दोनों मम्मे को मसल रहे थे। मैं भी अपने स्तनों पे पहली बार किसी मर्द के स्पर्श का आनन्द ले रही थी।
“अब कैसा लग रहा है… कल ऐसे ही दूध निकालते हुए देखा था ना?”
एक नाजुक कमसिन जवान लड़की के मुलायम मम्मे को दबाते हुए उनको भी बहुत मजा आ रहा था।

“तुम बहुत गर्म हो गयी हो!” ऐसे कहते हुए उन्होंने फिर से कामवासना से खड़े हुए मेरे निप्पल्स को उंगलियों से मसला। मैंने फिर से “आहहहह… मत करो” कर सिसकारी भरी; पानी के अंदर उनका पूरा खड़ा हुआ लंड मेरी गांड को टच कर रहा था।
मैं इस नए अनुभव का मजा लेते हुए आँखें मूंद कर खड़ी थी।

फिर राघव जी ने मुझे अपनी तरफ घुमाया, अब उनका लंड मेरे पेट को स्पर्श करने लगा, मैंने हल्के से आँखें खोली… मेरे सामने मुझसे बड़े उम्र का आदमी खड़ा था और उसके सामने मैं पूरी नंगी खड़ी थी।
मुझे पूरी नंगी देखने वाला वह पहला आदमी था। मैंने अपने मन में मजाक में सोची घटना अब सच्ची होती दिखाई दे रही थी।

मैं शर्माते हुए नीचे की तरफ देख रही थी। राघव जी ने हल्के से मेरे मुंह को ऊपर किया, मैंने भी बहुत प्यार से उनकी आंखों में देखा; उनकी आंखों में एक नशा सा दिखा।
मैंने शर्माते हुए फिर से अपनी आंखें नीची की; मेरे मुखड़े पर शर्म की लाली छा गयी थी।

“नीतू तुम्हारे जितनी सुन्दर लड़की मैंने आज तक नहीं देखी थी। सच बोलूं तो तुम कपड़ों में जितनी सुन्दर दिखती हो उससे कहि सुन्दर तुम बिना कपड़ों के दिखती हो। राघव जी अपना लंड मसलते हुए बोले।

“कल जब तुम्हें गीले कपड़ों में देखा था ना… तब से तुम्हें बिना कपड़ों के देखने की इच्छा हो रही थी। यह इच्छा इतनी जल्दी सच होगी यह मैंने नहीं सोचा था.” मेरे कड़क निप्पल्स फिर से अपने मुंह में दबाते हुए राघव जी बोले।
मुझ पे अब कामुकता भारी हो रही थी, मेरी सांसें अब ज़ोरों से चलने लगी थी।

एक तो उनके मुंह से हो रही मेरी सुंदरता की तारीफ़ मुझे भा रही थी तो दूसरी और मेरे मम्मे मसलने से मेरी वासना और भड़क रही थी।
चंदू ने अब तक मिताली को पानी से बाहर निकाल कर फर्श पर पेट के बल लिटा दिया था और अपना मूसल उसकी चूदासी चुत में पेल भी दिया था।

चंदू का बड़ा लंड लेते समय मिताली भी जोर ज़ोर से सिसकारियाँ लेने लगी थी। चंदू का लंड भी राघव जी जितना बड़ा था। मिताली को देख कर ही पता चल रहा था कि वो इस खेल की पुरानी खिलाड़ी थी।
चंदू भी अपने दोनों हाथों से उनके बड़े बड़े मम्मे मसलते हुए उसकी चुत में दना दन धक्के दे रहा था।

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मैं उनकी चुदाई देख ही रही थी कि राघव जी ने मेरा मुँह उनकी तरफ घुमाया, अपने हाथों से मेरे गालों पे आए हुए बाल साइड में करते हुए उन्होंने अपने होंठ मेरे होंठों पे रख दिये। मेरे पिंक नाजुक होंठ उनके मर्दाना होंठों का स्पर्श होते ही अपने आप खुल गए। मेरे खुले होंठों में राघव जी ने आसानी से अपनी जीभ घुसा दी और मेरे जीभ से खेलने लगे।

राघव जी इस खेल में बहुत अनुभवी लग रहे थे; सिर्फ चुम्बन लेकर ही उन्होंने मुझे पागल बना दिया था। उनका एक हाथ मेरी बायीं चूची को दबा रहा था तो दूसरा हाथ मेरी टाँगों के बीच में पहुंच गया था।

मेरी चुत के ऊपर के बालों से कुछ देर खेलने के बाद उन्होंने अपनी मोटी उंगली मेरी चुत की पंखुड़ी में घुसाई। मेरी टाइट चुत को उनकी उंगली हल्के हल्के से मसल रही थी तो मैं भी मजे से उनके मुंह में सिसकारी भरने लगी। मैंने अपना हाथ उनके हाथ पे रखा और उनकी उंगली को और अंदर घुसाने की कोशिश करने लगी। उनकी मोटी उंगलियों ने अब मेरी चुत की पंखुड़ियों को अलग किया और बीच की उंगली चुत में घुसाने लगे।

ऐसा करते ही मैंने अपने होंठ उनके होंठों पर से हटा दिए और दर्द से चिल्ला उठी; पर वासना अब मेरे दर्द पर भारी हो रही थी; यह दर्द भी मुझे मीठा लगने लगा था; मेरी चुत का झरना अब जोर से बह रहा था।
मैंने उनकी उँगलियों को रास्ता देने के लिए अपनी टाँगों को थोड़ा चौड़ा किया; उनकी उंगली अब आसानी से मेरी चुत के छेद में घुस गई; मुझे थोड़ा दर्द हुआ पर मैं सह गयी।
दो इंच अंदर घुसने के बाद उनकी उंगली मेरी झिल्ली से टकरा गई। उनकी उंगली मेरी झिल्ली से टकराते ही मुझे मेरी चुत में एक तूफान बनता हुआ महसूस हुआ और देखते ही देखते उनकी उंगली मेरे सफेद रस से भीग गयी।

राघव जी ने अपनी उंगली मेरी चुत से बाहर निकाली और अपने मुँह में डाल दी। फिर अपना मुंह मेरे कान के पास ले कर के पूछा- अभी तक सोई नहीं तुम किसी के साथ?
मैंने ना में सिर हिलाते हुए शर्माकर उनकी घने बालों वाले सीने में अपना मुंह छुपा लिया।

“इसमे शर्माने की क्या बात है… अच्छी बात है ना… आज तुमको एक गांव का मर्द जवान करेगा… यह मजा तुम जिंदगी में नहीं भूल पाओगी!” राघव जी ने मुझे अपनी बाहों में उठा लिया और तालाब के बीच में जो उभरी हुई जगह थी वहाँ तक ले गए।

मुझे पानी में खड़ी कर के वो खुद उस उभरी हुई जगह पर बैठ गए। उनका लंड अब नर्म पड़ गया था, फिर भी 4-5 इंच का दिख रहा था। लंड देखते ही मुझे समझ में आ गया कि राघव को मुझसे क्या चाहिए था।
राघव ने एक हाथ मेरे सिर पर रख कर मुझे नीचे झुकाया और दूसरे हाथ से अपना लंड पकड़ कर मेरे होठों पर फेरने लगे। मैं अपना मुँह आजु बाजू घूमाने लगी पर उनकी ताकत के सामने मेरी एक भी न चली तो मैंने विरोध करना छोड़ दिया और मेरे कोमल होंठ खोल कर उनका लंड अपने मुँह में लिया।

मैंने कभी लंड नहीं चूसा था पर मैं उनको नाराज भी नहीं करना चाहती थी। मैं कुछ भी करके उनका लंड चूस रही थी पर उस क्रिया मैं मेरे दांत उनके लंड पर लग रहे थे। उनका लंड ठीक से चूसने के लिए उन्होंने मुझे ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया।
मैंने सब झट से सीख लिया और उनका लंड मजे से चूसने लगी।

मेरी जादुई चुसाई से उनका लंड फिर से अपने विशाल आकार में आने लगा; उनका लंड अब मेरे मुंह में नहीं समा रहा था; लंड का खारा स्वाद मुझे अच्छा लगने लगा था पर उनके लंड के आकार से मेरा मुँह दुखने लगा था।

मुझे तकलीफ होती देख कर उन्होंने अपना लंड मेरे मुँह से निकाल लिया और नीचे उतर गए।

अब उन्होंने मुझे उठा कर उभरी हुई जगह के कोने पर पीठ के बल लिटा दिया, मेरे पैर अभी भी पानी में ही थे।

अगले ही पल राघव जी ने मेरी टाँगें उठा ली और मेरे टाँगों के बीच में आ गए, उनके चौड़े शरीर से मेरी टांगें पूरी फैल गयी थी और मेरी चुत उभर कर सीधे उनके लंड के सामने आ गयी थी।
अब राघव जी थोड़ा और आगे हुए और उनका लंड मेरी झाँटों में घिसने लगा।

“नीतू… तुम अपने हाथों से मेरे लंड को अपनी चुत के मुख पे रखो!” राघव जी ने अपनी मर्दाना आवाज में बोला।
मैंने सम्मोहित हो कर उनका लंड अपने हाथों से मेरी चुत के दरवाजे पे रखा, पर मुझे बहुत टेंशन भी हो रही थी कि उनका मूसल जैसा लंड मेरी कमसिन चुत में घुसेगा कैसे।

अब तक घटी घटनाओं से मेरी चुत बह कर काफी गीली और चिपचिपी हो गयी थी पर फिर भी उनका लंड मेरी चुत से बहुत मोटा था।

इसी डर से मैंने अपने वासना पे कंट्रोल करते हुए एक कोशिश करने की सोची- राघव जी… प्लीज नहीं… मुझसे नहीं होगा… प्लीज मुझे जाने दो!
“अरे जानेमन क्यों झूठ बोल रही हो… मुझे मालूम है तुम्हें भी यही चाहिए… तुम्हारा शरीर भी यही मांग रहा है… देखो तुम्हारी कमर कैसे मेरा लंड लेने के लिए उछल रही है… क्यों अपने आप को फंसा रही हो… और डर क्यों रही हो? कुछ भी नहीं होगा… मैं आराम से करूँगा… तुम्हारी सहेली को देखो… उसको जब मैंने चोदा था तब वो तुमसे भी छोटी थी… लेकिन अब देखो एकदम आराम से लेती है मेरा लंड… जब भी छुट्टी पर आती है तो 10-15 बार उसको चोदता हूँ, और उतनी ही बार ये चंदू भी उसको चोदता है… तुम भी कर पाओगी!”

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वासना और डर से सनी मेरी आंखों में देख कर राघव जी बोले और मेरी टाँगें पकड़ कर अपनी कमर पर लपेट ली और मेरी कमर को पकड़ लिया।
“नीतू तुम रिलैक्स करो… कमर और चुत को ढीला छोड़ दो… मैं बिल्कुल आराम से करूँगा.” मेरी झाँटों में उंगलियाँ घुमाते हुए उन्होंने मुझे बोला।

मैंने भी उनकी बात पे भरोसा करते हुए जैसा वो बोलते रहे, वैसा किया।

मेरी चुत के होंठ ढीले होते ही राघव जी ने अपने लंड का दबाव बढ़ाया और एक ही झटके में उनके लंड का टोपा मेरी चुत फैलाते हुए अन्दर घुस गया।

मेरी तो जैसे जान हो निकल गयी… लेकिन तभी उन्होंने अपने हाथ मेरी कमर से हटाते हुए मेरी चुचियों पे रखा और उनको सहलाने लगे; अब थोड़ा नीचे झुकते हुए मुझे किस करने लगे।
किसिंग और चुचियों को सहलाने से मुझे थोड़ा आराम मिला, मेरी चुत की जलन भी अब कम हो रही थी।

मैंने अब मेरे पैरों की पकड़ उनकी कमर पर ढीली कर दी और चुत को भी ढीला छोड़ दिया। अब उन्होंने धीरे धीरे धक्के देना शुरू कर दिया। उनका बड़ा लंड मेरी चुत की दीवारों पर घिसने लगा था। मैं उनका लंड आधा आधा सेंटिमीटर अंदर घुसता हुआ महसूस कर रही थी; मेरी चुत उनके लंड को टाइट पकड़े हुए थी; उनका लंड अब मेरी झिल्ली तक पहुंच गया था।

“नीतू… अब थोड़ा दुखेगा… थोड़ा सहन करो मेरी रानी!” कह कर वो फिर से मुझ पे झुके, मेरी एक चूची को अपने मुंह में लेकर चूसने लगे तो दूसरी को हाथों से सहलाने लगे।

उन्होंने अब अपनी कमर को पीछे लिया और जोर का धक्का दिया।
‘क्या हो रहा है!’ यह समझ में आने के पहले ही मेरी पतली झिल्ली फट चुकी थी; मेरे मुँह से एक तेज चीख निकली जो घने जंगल में खो गई।

राघव जी ने अपना लंड वैसे ही रखा और वापस मेरे एक चूची को चूसने लगे और दूसरी को सहलाने लगे।

मेरी चुचियों पे हो रही मीठी चढ़ाई ने मुझे मेरी चुत की जलन को भुलाने मदद की, मेरा दर्द कम होने लगा और उसकी जगह वासना ने ले ली। मैंने अपनी उँगलियों को उनके सिर के बालों में घूमाते हुए प्यार से उनकी तरफ देखा।
राघव जी भी प्यार से मेरी आंखों में देखते हुए खड़े हो गए, उनका लंड अब भी मेरी चुत में धंसा हुआ था।

मेरी कमर पर मजबूत पकड़ बनाते हुए उन्होंने अपना लंड धीरे धीरे से बाहर निकाला; उनका पूरा लंड मेरे कौमार्य के खून से सना था। खून से भीगे लंड को देख कर वो और भी खुश हुए, एक अनछुई जवान लड़की आज उनको चोदने को मिली थी।

उन्होंने फिर से अपना आधा लंड मेरी चुत में घुसाया और धीरे धीरे धक्के लगाने चालू कर दिए। उनका हर धक्का और उनकी कमर हिलाने से मेरी चुत पे टकराता हुआ तालाब का ठंडा पानी दोनों ही मेरी चुत की आग को ठंडा कर रहे थे।

धीरे धीरे उनका लंड मेरी चुत में और अंदर घुस रहा था। उनके विशाल लंड से मेरी चुत पूरी फ़ैल रही थी, खिंच रही थी, उनका लंड मेरी चुत में एकदम टाइट बैठा था।
वो अपना पूरा लंड बाहर खींच कर अंदर घुसा देते थे; उनके हर झटके मुझे मेरे चरम पर पहुँचा रहे थे। उनका लंड मेरी चुत के रस से चमक रहा था।

अचानक से मुझे मेरी चुत के अंदर एक तूफान बनता हुआ महसूस हुआ; मैंने जोर से उनको अपनी तरफ खींचा और उनको ज़ोरों से पकड़ कर झड़ने लगी।
राघव जी को भी पता चला कि क्या हो रहा है, उन्होंने भी धक्के देने चालू ही रखे।

मैं मेरी लाइफ का पहला पूरा ऑर्गेज़म एन्जॉय कर रही थी जो मुझे मेरी पहली चुदाई के दौरान मिला था, वो भी मुझसे 10-12 साल बड़े एक ताकतवर जवान से।
मुझे मेरे आर्गेज्म से बाहर निकलने में लगभग एक से दो मिनट लगे। मेरी चुत के रस से उनका पूरा लंड चिपचिपा हो गया था।

उन्होंने मुझे वापस तैयार होने में थोड़ा समय दिया, फिर उठ कर मेरी टाँगों के बीच फिर से पोजीशन ले ली; मैं अभी भी आँखें बंद कर के ओर्गास्म एन्जॉय कर रही थी। उनका लंड अभी भी मेरी चुत में था पर पूरा नहीं घुसा था।

चंदू और मिताली भी अपना पहला राउंड खत्म करके कोने से हम दोनों की कामक्रीड़ा देख रहे थे।

राघव जी अपना लंड बाहर निकलने लगे, उनका लंड मेरी चुत के मुँह तक बाहर निकला तो मैंने नाराजगी से उनकी तरफ देखा।
उनको मेरी आँखों की भाषा समझ में आ गयी और बोले- नीतू रानी… बस हो गई यह नाजुक चुदाई… अब तुम्हें असली मर्दानी चुदाई का मजा दिलाता हूँ!

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मैं कुछ पूछ पाती… तब तक उन्होंने मेरी कमर को पकड़ते हुए जोर का धक्का दिया।
“ऊईईई… माँआआआ…”
उन का छह सात इंच का लंड मेरी चुत के गहराई में घुस गया था। राघव जी अब नीचे जुकते हुए मेरे दर्द से तड़पते हुए जिस्म पर हिचकोले खाते मेरे चुचों को बारी बारी मुख में लेकर के चूसने लगे और सहलाने लगे।

दर्द की एक तेज लहर मेरे दिमाग तक पहुँच गयी थी, दर्द की वजह से मैं लगभग बेहोश हो गई थी पर राघव जी की जादुई चुदाई फिर से मुझे रोमांचित कर रही थी। मैं अब उनके सर में मेरी उंगलियाँ घुमाते हुए उनका सर मेरी चुचियों पर दबा रही थी और नीचे से कमर हिला रही थी।

राघव जी का लंड मेरे अंदर तक बिल्कुल मेरी बच्चेदानी में जाकर अटक गया था। शायद यह अहसास उनके लिए भी नया था, उनके चेहरे पर फैली हुई मुस्कान सब बयाँ कर रही थी।

फिर से उन्होंने अपना लंड पूरा बाहर खींच लिया और ज़ोर से पेल दिया पर इस बार मैं भी तैयार थी अपने होंठ दांतों तले दबाते हुए उनका धक्का सहन कर गयी। उनका लंड फिर से मेरी बच्चेदानी में जाकर अटक गया।
मैंने अपने पेट की नसों को थोड़ा हल्का छोड़ा इससे मेरी बच्चेदानी थोड़ी ढीली पड़ गई; राघव जी ने फिर से अपना लंड खींच कर बाहर निकाल लिया।

उनके लंड के आकार को धक्कों का अंदाजा लेते हुए मैंने अपने शरीर को ढीला छोड़ा और एन्जॉय करने लगी। राघव जी ने अब स्पीड पकड़ कर मुझे चोदना चालू किया; उनके हर धक्कों पे मेरा पूरा बदन उछल रहा था, उस ठंडे पानी में ठप ठप आवाज करते हुए उनके लंड को मैं भी कमर हिलाते हुए साथ देने लगी थी।

राघव जी ने भी एक हाथ से मेरी कमर को पकड़ा हुआ था तो दूसरे हाथ से मेरी कमर के चांदी की चैन से खेल रहे थे।

हमारा खेल लगभग दस पंद्रह मिनट से चल रहा था। उनका भी बांध फटने वाला था, उन्होंने अपने धक्के और तेज कर दिए; मैं भी उतनी ही स्पीड में कमर हिला कर उनका साथ देने लगी। मेरी चुत ने उनके लंड के आकार को अपना लिया था।

उन्होंने अब मेरे हिचकोले खाते हुए चुचों को दोनों हाथों से दबोच लिया और तेज धक्के देने लगे।

“आह… नीतू… मेरी रानी, ले मेरा लंड… और ले… बड़ी मस्त है तेरी चुत… पहली बार में ही पूरा अंदर ले लिया है तूने… आह… देख कैसा मेरा लंड अंदर खींच रही है… मैं आ रहा हूँ जान… ले मेरा लंड…”
उनका लंड अब मेरी बच्चेदानी भी फाड़ने लगा था।

उनकी बातें सुनने ही मैं शर्म से चूर हो गई मैंने फिर से उनको अपने आगोश में भर लिया। मेरी चुत का बांध फिर से छूट गया, मेरी चुत फिर से झरने की तरह बहने लगी। मेरे पानी का स्पर्श होते ही राघव जी का भी बांध छूट गया। गर्म वीर्य की तेज धार उनके लंड से मेरी चुत में पड़ने लगी, उनके लंड की धार मेरी बच्चेदानी को भिगोने लगी।
हम दोनों एक दूसरे को बांहों में जकड़ने लगे।

उनका लंड अब मेरी चुत में सिकुड़ने लगा; हम दोनों का कामरस मेरी चुत से बह कर पानी में मिलने लगा।

अभी तक न अनुभव किया हुआ सुख मुझे मेरी बदन से बाहर बहता मैं महसूस कर रही थी। अचानक मुझे मेरी जिस्म में खालीपन महसूस हुआ। मैंने आँखें खोल कर देखा तो राघव जी मेरे जिस्म पर से उठ गए थे और उन्होंने अपना लंड बाहर खींच लिया।
वो अब वो मुझे निहारने लगे।

मेरी गोरी काया को कुछ देर निहारने के बाद उन्होंने नीचे झुककर मेरी चुत को किस किया तो एक तेज लहर पूरे बदन से गुजरी। मेरे हाथ अपने आप ही उनके सिर के बालों में पहुंच गए। एक मर्दाना चुदाई के बाद सूजी हुई चुत को उनके नर्म होंठों से राहत मिल रही थी।

मेरे हाथों के दबाव से उनके होंठ मेरी चुत के अंदर घुस गए। राघव जी ने भी अपनी जीभ से मेरी चुत को नीचे से ऊपर तक चाटा।

यह सब मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था। मैंने थोड़ी देर पहले राघव को मुखमैथुन का सुख दिया था… पर वही सुख मुझे भी मिलेगा इसकी कल्पना भी नहीं की थी।
राघव जी मेरी चुत को अंदर से चाट रहे थे। उन्होंने हाथों से मेरे पैरों को और चौड़ा कर दिया और पैरों के बीच में आ गए। उन्होंने उंगलियों से मेरी चुत को फैलाते हुए उन्होंने मेरे दाने को होंठों से पकड़ कर चूसने लगे।

उनकी चुसाई से मेरी चुत ने फिर से पानी छोड़ दिया। जिंदगी में कभी भी ना खेले इस खेल में मैं चार बार झड़ गयी थी।

राघव जी ने मेरा सारा रस चाट लिया और वहां से उठकर पानी के बाहर चले गए।

अभी तक हुई चुदाई की लहरों पे सवार होकर मैं आँखें बंद करके सारा सुख पूरे शरीर में समाते हुए वही लेटी रही; प्रथम चोदन का सुख और मीठा दर्द दोनों अनुभव ले रही थी। उसी में मेरी कब आंख लग गई मुझे पता भी नहीं चला।

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